ऑनलाइन पोर्टल केवल आवेदन स्वीकार करते हैं. वे स्वयं नाम नहीं हटा सकते.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर अपना हमला तेज कर दिया कि और उस पर 'वोट चोर' कहे जाने वाले लोगों को बचाने का आरोप लगाया है. गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया कि 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों के दौरान एक केंद्रीकृत, सॉफ्टवेयर-आधारित अभियान के जरिए हजारों कांग्रेस समर्थकों के नाम हटाने का लक्ष्य बनाया गया था. राहुल गांधी के इन आरोपों को चुनाव आयोग ने तत्काल खारिज कर दिया. कहा कांग्रेस सांसद को नियमों की समझ नहीं है. इसके बावजूद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या कोई मतदाता सूची से आपका नाम काट सकता है.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि उन्होंने कहा कि अलांद निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 6 हजार नाम एक ऐसे प्रोग्राम द्वारा चुने गए थे जो स्वचालित रूप से 'हर बूथ के पहले मतदाता' का इस्तेमाल करके नाम हटाने के इच्छुक आवेदक का रूप धारण कर लेता था. उन्होंने मंच पर एक मतदाता, जिसका नाम हटाने का प्रयास किया गया था और एक पड़ोसी, जिसके विवरण का दुरुपयोग किया गया था, दोनों को परेड कराई, दोनों ने कोई भी अनुरोध दायर करने से इनकार किया.
मोबाइल फोन और ओटीपी डाटा जारी करे EC
राहुल गांधी ने तर्क दिया कि यही प्रणाली कई राज्यों में इस्तेमाल की जा रही है. महाराष्ट्र के राजुरा निर्वाचन क्षेत्र को लेकर उन्होंने आरोप लगाया कि 6,815 नाम धोखाधड़ी से जोड़े गए थे, जिससे पता चलता है कि सॉफ्टवेयर हटाने और जोड़ने, दोनों में सक्षम था. उन्होंने कहा कि यह तरीका केवल कर्नाटक और महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक भी लागू है. उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग एक हफ्ते के भीतर इन एप्लीकेशन में इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन और ओटीपी का डाटा जारी करें.
चुनाव आयोग का जवाब - राहुल ने गलत समझा
चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. उसने कहा कि वोटों को ऑनलाइन नहीं हटाया जा सकता. इस प्रक्रिया को राहुल गांधी ने गलत समझा है. पोर्टल और ऐप्स केवल आवेदन दाखिल करने की अनुमति देते हैं, जिनकी फिर जांच की जाती है. उसने जोर देकर कहा कि नोटिस जारी किए बिना और मतदाता को सुनवाई का अवसर दिए बिना कोई भी नाम नहीं हटाया जा सकता.
अलंद मामले में आयोग ने साफ किया कि 2023 में विसंगतियों को स्वयं चुनाव आयोग ने खुद चिह्नित किया था और प्राथमिकी दर्ज की थी. उसने बताया कि वास्तव में कांग्रेस ने 2023 में अलंद सीट जीती थी, जिसके व्यवस्थित रूप से निशाना बनाए जाने के दावों को कमजोर कर दिया गया.
चुनाव आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता सूची से नाम हटाना कानून द्वारा नियंत्रित होता है, तकनीक द्वारा नहीं. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960, मतदाता सूची से नाम हटाने की रूपरेखा निर्धारित करते हैं. यह प्रक्रिया दुरुपयोग को रोकने और यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है कि बिना सूचना दिए या चुनौती देने का मौका दिए बिना कोई भी अपना वोट न खो दे.
मतदाता सूची ने नाम हटाने की प्रक्रिया फॉर्म 7 भरने से शुरू होती है. अगर कोई मतदाता का नाम हटाना चाहता है या मतदाता सूची में किसी नाम पर आपत्ति करता है, तो उसे निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को फॉर्म 7 जमा करना होता है. उसे निर्वाचन क्षेत्र का नाम, मतदाता को EPIC नंबर, नाम हटाने का कारण और आवेदक का अपना विवरण और हस्ताक्षर जैसी प्रमुख जानकारी देनी होती है. जमा करने के बाद स्थानीय बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) एक पावती जारी करता है.
मनमाने या राजनीतिक आधार पर नाम हटाने की मांग नहीं की जा सकती. इसके बाद ईआरओ अनुरोध की जांच करता है. प्रत्येक आवेदन को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है. यदि कोई फॉर्म अधूरा या दोषपूर्ण है तो उसे प्रारंभिक चरण में ही अस्वीकार किया जा सकता है. नाम हटाने का काम जमीनी स्तर सत्यापन के बाद होता है. साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, ईआरओ या तो आवेदन को अस्वीकार कर देता है या नाम हटाने को मंजूरी देता है. यदि मंजूरी मिल जाती है तो नाम हटा दिया जाता है.
जो मतदाता मानता है कि उसका नाम गलती से हटा दिया गया है, वह ईआरओ के आदेश को चुनौती दे सकता है. वे निवास और पहचान के प्रमाण के साथ फॉर्म 6 भरकर नाम शामिल करने के लिए नए सिरे से आवेदन भी कर सकते हैं. फॉर्म 7 आवेदन में की गई झूठी घोषणाएं जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 के तहत दंडनीय हैं.
क्या कोई पड़ोसी आपका वोट हटा सकता है?
कानूनी तौर पर उसी निर्वाचन क्षेत्र का कोई भी मतदाता किसी अन्य मतदाता के नाम पर आपत्ति जताते हुए फॉर्म 7 दाखिल कर सकता है, लेकिन इससे वोट स्वतः नहीं हटता. निर्वाचन अधिकारी (ईआरओ) द्वारा कोई भी आदेश पारित करने से पहले नोटिस जारी करना, सत्यापन करना और सुनवाई करना आवश्यक है. इन चरणों के बिना, नाम हटाना गैरकानूनी है. झूठा आवेदन दाखिल करना एक दंडनीय अपराध है.
क्या कोई सॉफ्टवेयर या ऑटोमेशन वोटों को हटा सकता है?
राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि फर्जी मोबाइल नंबर और ओटीपी का उपयोग करके एक स्वचालित प्रणाली के माध्यम से हजारों आवेदन दाखिल किए गए थे. नियमों के तहत ऑनलाइन पोर्टल केवल आवेदन स्वीकार करते हैं. वे स्वयं नाम नहीं हटा सकते. हर मामले में सत्यापन और सुनवाई की आवश्यकता होती है. संदिग्ध सामूहिक हेरफेर के मामलों में भी, ईआरओ को उचित प्रक्रिया का पालन करना होता है. यदि गलत तरीके से ऐसा किया गया तो यह धोखाधड़ी और आपराधिक षडयंत्र के समान माना जाता है. यह स्वयं कानूनी सुरक्षा उपायों को दरकिनार नहीं करेगा. सॉफ्टवेयर सिस्टम में आवेदनों की बाढ़ ला सकता है. यह स्वयं मतदाता सूची से नाम नहीं मिटा सकता.
यूपीएससी PDS स्कीम
यूपएससी UPSC की PDS स्कीम: UPSC की सिविल सेवा परीक्षा को देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित परीक्षाओं में गिना जाता है. हर साल लाखों उम्मीदवार इसमें शामिल होते हैं, लेकिन गिने-चुने ही IAS, IPS, या IFS बन पाते हैं, लेकिन अब सवाल ये है कि जिन लोगों ने इंटरव्यू तक पहुंचकर भी फाइनल लिस्ट में जगह नहीं बनाई, उनके लिए क्या कोई विकल्प है? इसका जवाब यह है कि अब UPSC की नई PDS स्कीम ऐसे प्रतिभाशाली युवाओं के लिए एक नई उम्मीद बनकर सामने आई है.
क्या है पीडीएस स्कीम?
यह स्कीम उन उम्मीदवारों को सरकार के अन्य महकमों में नियुक्त करने का रास्ता खोलती है, जो सिविल सेवा की अंतिम परीक्षा तक पहुंचकर भी असफल रहे. ये पहल न सिर्फ टैलेंट की बर्बादी को रोकती है बल्कि सिस्टम को भी और अधिक दक्ष और प्रोफेशनल बनाती है.
दरअसल, यूपीएससी हर साल 10 नियमित परीक्षाएं आयोजित करता है और विभिन्न सेवाओं में नियुक्तियों के लिए लगभग 6,400 सफल उम्मीदवारों की सिफ़ारिश करता है. लगभग 26,000 उम्मीदवार, जिन्होंने पहले ही कठिन लिखित परीक्षाएं पास करके अपनी दक्षता का प्रदर्शन कर दिया है, प्रक्रिया के अंत में असफल घोषित कर दिए जाते हैं.
यद्यपि यह योजना 2018 में इन प्रतिभाशाली युवाओं को सरकारी संगठनों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में रोजगार के अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, लेकिन इन उम्मीदवारों को कुछ ही सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी संस्थानों में नियुक्ति दिलाने में मामूली सफलता मिली है। इनमें कैबिनेट सचिवालय, जल संसाधन विभाग, नदी विकास और गंगा संरक्षण, दिल्ली जल बोर्ड और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण जैसे संगठन शामिल हैं, लेकिन इनकी संख्या वास्तव में बहुत कम थी। इसका विस्तार करने का एकमात्र तरीका इसका दायरा बढ़ाना था.
पीडीएस, जिसे बाद में प्रतिभा सेतु नाम दिया गया, के दायरे को व्यापक बनाने के लिए, आयोग ने एक समर्पित पोर्टल लॉन्च किया है, जहां पंजीकृत निजी कंपनियां, सरकारी स्वामित्व वाली संस्थाओं के साथ, एक पहचान संख्या (कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा सत्यापित एपीआई, जो व्यवसायों को भारत में एमसीए डेटाबेस से सीधे कंपनी की जानकारी तक पहुंचने और सत्यापित करने की अनुमति देता है) का उपयोग करके उम्मीदवारों की जानकारी प्राप्त कर सकती हैं. इसके बाद वे उन गैर-अनुशंसित उम्मीदवारों की सूची देख सकते हैं जिन्होंने अपनी जानकारी साझा करने की इच्छा व्यक्त की है, जिसमें उनके प्रतिशत (पूर्ण या प्रतिशत अंक नहीं) उपलब्ध कराए जा रहे हैं.
उम्मीदवारों के संक्षिप्त बायोडेटा, उनकी शैक्षणिक योग्यता, संपर्क नंबर आदि के साथ, लॉग इन करने वालों के लिए भी उपलब्ध कराए गए हैं, जिनमें निजी क्षेत्र के खिलाड़ी भी शामिल हैं। यह पोर्टल पंजीकृत संगठनों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप उपयुक्त उम्मीदवारों की पहचान करने के लिए विषय और अनुशासन-वार खोज सुविधाएं भी प्रदान करता है।
उम्मीदवारों की सूची अब सिविल सेवा परीक्षा के लिए साझा की जा रही है; साथ ही कई अन्य यूपीएससी परीक्षाओं के लिए भी, जिनमें इंजीनियरिंग सेवा परीक्षा शामिल है; भारतीय वन सेवा परीक्षा; केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (एसीएस) परीक्षा; संयुक्त भू-वैज्ञानिक परीक्षा; सीआईएसएफ सहायक कमांडेंट (कार्यकारी) एलडीसीई; संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा; भारतीय आर्थिक सेवा/भारतीय सांख्यिकी सेवा परीक्षा; राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और नौसेना अकादमी परीक्षा; और संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा। सभी प्रासंगिक विवरणों के साथ सूची पोर्टल पर उपलब्ध है, जिसे उद्योग पंजीकरण के बाद लॉग इन करके देख सकते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि यूपीएससी, संगठनों द्वारा उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किए जाने के बाद से लेकर नियुक्ति पत्र जारी होने तक उनकी चयन प्रक्रिया पर भी लगातार नजर रख रहा है. इसमें इस योजना के लिए पंजीकरण कराने वाली कंपनियों को आयोग द्वारा नियमित रूप से कॉल करना और लॉगिन बनाना शामिल है. एक अधिकारी ने बताया कि मास्टर लिस्ट से चयन की स्थिति को लगभग वास्तविक समय के आधार पर बैकएंड पर अपडेट किया जा रहा है. पोर्टल पर नियुक्ति पत्र की एक प्रति अपलोड करने की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है, जिसे सफलता दर की गणना के लिए सारणीबद्ध किया जा रहा है.
अधिकारी ने कहा, "यह पोर्टल यूपीएससी द्वारा आयोजित परीक्षाओं के गैर-अनुशंसित उम्मीदवारों की जानकारी केवल रोजगार के लिए उम्मीदवारों की उपयुक्तता के मूल्यांकन के सीमित उद्देश्य से साझा करता है और मूल्यांकन करने वालों से किसी अन्य उद्देश्य या प्रकटीकरण के लिए विवरण का उपयोग करने की अपेक्षा नहीं की जाती है."
क्या है अरुण कुमार की कहानी?
अरुण उन 26 हजार उम्मीदवारों में से एक थे जो साक्षात्कार में उत्तीर्ण नहीं हो पाए, लेकिन अपनी परीक्षा श्रेणी में 97 प्रतिशत से ऊपर अंक प्राप्त किए, और प्रवेश स्तर की नौकरी के लिए अधिक योग्य थे, लेकिन साथियों की तुलना में उनकी आयु भी अधिक थी, और उनके पास कार्य अनुभव का अभाव भी था.
उत्तीर्ण होने की कोशिश में अपने सभी अवसर और अपनी युवावस्था का एक बड़ा हिस्सा गंवा देने के बाद उनके सामने वही दुविधा आ गई जिसका सामना इस परीक्षा में बैठने वाले अधिकांश लोग करते हैं. देर से ही सही, पेशेवर जीवन की शुरुआत नए सिरे से करनी पड़ी. अति-योग्य होने के बावजूद, उन्होंने वह एकमात्र नौकरी स्वीकार कर ली जो उन्हें बहुत खोजबीन के बाद मिली - दिल्ली के बाहरी इलाके में एक पब्लिक स्कूल में प्रवेश स्तर के प्रशासनिक सहायक की.
तभी उन्हें दिल्ली स्थित एक कॉर्पोरेट कंपनी से फोन आया, जिसने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा में उनके प्रदर्शन के बारे में पूरी जानकारी दी और उनकी मास्टर्स डिग्री को ध्यान में रखते हुए, उस परीक्षा के अंतिम से पहले के चरणों में उनके बेहतरीन प्रदर्शन के आधार पर उनका मूल्यांकन किया और अंततः उन्हें मध्यम-वरिष्ठता ग्रेड पर नौकरी पर रखा और उनका वेतन स्थानीय स्कूल में मिलने वाले वेतन से कई गुना ज्यादा था. नए नियोक्ता के यहां नौकरी का पद उनकी शैक्षणिक योग्यताओं के ज्यादा अनुरूप था, और भारत की सबसे कठिन योग्यता परीक्षा मानी जाने वाली परीक्षा में उनके प्रदर्शन को उचित रूप से मान्यता दी गई.
Cyclone Montha
देश के पूर्वी तट पर बसे आंध्र प्रदेश के लिए एक खतरनाक घड़ी शुरू हो चुकी है. समुद्र से उठे हवाओं ने तूफान Cyclone Montha का रूप ले लिया है. लैंडफॉल के बाद मोंथा ने 90–110 किमी/घंटा की रफ्तार से कई जिलों को अपने दायरे में ले लिया है. इसी बीच तीन लोगों की जान चली गई है और प्रभावित इलाकों में हाई अलर्ट जारी है.
तूफान मोंथा बंगाल की खाड़ी में बना था और पूर्वी तट की ओर बढ़ रहा था. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने आंध्र प्रदेश के 19 जिलों में रेड अलर्ट जारी किया है. लैंडफॉल की प्रक्रिया मंगलवार शाम शुरू हुई थी और बुधवार की सुबह तक इसका असर जारी रहा.
हवाओं की रफ्तार 90-100 किमी/घंटा तक दर्ज हुई, कभी-कभी 110 किमी/घंटा तक भी महसूस हुई. मौसम के बिगड़ने के कारण अनेक जिलों में पेड़ उखड़ गए, विद्युत लाइनों का नुकसान हुआ, सड़कें बंद हुईं.
राज्य सरकार ने तकरीबन 76,000 लोगों को राहत शिविरों में स्थानांतरित किया. कृषि पर भी बड़ी चोट लगी है: लगभग 38,000 हेक्टेयर फसल तबाह हुई तथा 1.38 लाख हेक्टेयर बाग-बगीचे प्रभावित हुए. तीन मौतों की खबरें आ रही हैं. स्रोतों के अनुसार केनसेमा क्षेत्र में एक महिला की पेड़ गिरने से मौत हुई है, अन्य दो मौतें नाव पलटने एवं अन्य हादसों में हुईं.
राहत-कार्य जारी है
NDRF और SDRF टीमों को तैनात किया गया है, स्कूल बंद कर दिए गए हैं, वाहन चलाना बंद करने का निर्देश दिया गया है. मौसम विभाग का अनुमान है कि तूफान आगे उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ेगा और कुछ घंटों में ‘‘गहरी Depression’’ में बदल सकता है.
सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 21 अगस्त, 2025 को केंद्र सरकार से पूछा कि अगर राज्यपाल सालों तक विधेयकों को रोके रखते हैं, जिससे राज्य विधानमंडल ‘निष्प्रभावी’ हो जाता है तो क्या ऐसी स्थिति में अदालतों के पास हस्तक्षेप करने की शक्ति नहीं है.
चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालतों को ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप करने और बाध्यकारी निर्देश देने से बचना चाहिए और इस तरह के गतिरोध से निपटने के लिए राजनीतिक समाधान निकाला जा सकता है.
यह रवैया विधायिका को निष्क्रिय कर देगा
संविधान पीठ में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर भी शामिल हैं. पीठ ने मेहता से कहा, 'बहुमत से निर्वाचित विधानसभा सर्वसम्मति से विधेयक पारित करती है. अगर राज्यपाल अनुच्छेद-200 के तहत किए गए प्रावधान का इस्तेमाल नहीं करते हैं तो यह वस्तुतः विधायिका को निष्प्रभावी बना देगा. जो लोग निर्वाचित होते हैं, उनके लिए क्या सुरक्षा है.'
उसने कहा, 'क्या हम कह सकते हैं कि संवैधानिक पदाधिकारी चाहे कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हों, अगर वे अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं तो फिर अदालत के पास ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप करने की शक्ति नहीं है? विधेयक को मंजूरी दी गई है या लौटाया गया है, हम इसके कारणों पर विचार नहीं कर रहे हैं कि उन्होंने सहमति क्यों दी या नहीं दी. मान लीजिए कि राज्यपाल अगर सक्षम विधायिका की ओर से पारित किसी अधिनियम पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगा देते हैं तो फिर क्या होगा?'
व्यवस्था के भीतर खोजें समाधान
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की पीठ राष्ट्रपति के उस संदर्भ पर सुनवाई कर रही है, जिसके तहत उन्होंने यह जानने का प्रयास किया है कि क्या अदालतें राज्य विधानसभाओं में पारित विधेयकों पर विचार करने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा निर्धारित कर सकती हैं. मेहता ने कहा कि अदालतों को ऐसी स्थिति में कोई मिसाल कायम नहीं करनी चाहिए, बल्कि व्यवस्था के भीतर से ही समाधान खोजने का प्रयास किया जाना चाहिए.
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत तमिलनाडु के राज्यपाल के पास लंबित विधेयकों को पारित मान लिया गया. मेहता ने कहा, 'इन विधेयकों को पारित मान लेने संबंधी निर्देश संविधान का उल्लंघन है.' उन्होंने दलील दी कि अदालतें किसी अन्य संवैधानिक पदाधिकारी की भूमिका में खुद को प्रतिस्थापित नहीं कर सकतीं.
विधेयकों पर कार्रवाई के लिए समय-सीमा तय नहीं
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि विधानसभा में पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती, क्योंकि संविधान में इन संवैधानिक पदाधिकारियों के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है. पीठ ने कहा कि वह 8 अप्रैल के फैसले की समीक्षा करने के लिए अपीलीय क्षेत्राधिकार में नहीं है.
चीफ जस्टिस ने कहा, 'हम आपकी समयसीमा संबंधी दलील की सराहना करते हैं, लेकिन एक ऐसी स्थिति पर विचार करें, जहां राज्यपाल को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए, लेकिन वह चार साल से अधिक समय तक विधेयकों को लंबित रखते हैं. लोकतांत्रिक व्यवस्था या उस दो-तिहाई बहुमत का क्या होगा, जिसके जरिये सरकार निर्वाचित होती है और लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है?'
केंद्र सरकार से किया सवाल
मेहता ने कहा कि राजनीतिक रूप से समाधान निकालना होगा और उन्होंने राष्ट्रपति के संदर्भ पर अपनी दलीलें समाप्त कीं. मध्यप्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने अपनी दलीलें शुरू कर दी हैं. सुनवाई 26 अगस्त को फिर से शुरू होगी. इससे पहले पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा था कि अगर संवैधानिक पदाधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन न करें या राज्य विधानसभाओं में पारित विधेयकों पर राज्यपाल की ओर से निष्क्रियता दिखाई जाए तो क्या संवैधानिक अदालतें हाथ पर हाथ धरे रह सकती हैं.
पीठ ने यह टिप्पणी सॉलिसिटर जनरल की इस टिप्पणी पर की है कि अगर कुछ राज्यपाल विधानसभा में पारित विधेयकों को लंबित रखते हैं तो राज्यों को न्यायिक समाधान के बजाय राजनीतिक समाधान तलाशने चाहिए. जस्टिस गवई ने मेहता से सवाल किया, 'अगर संवैधानिक पदाधिकारी बिना किसी कारण के अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करते हैं तो क्या एक संवैधानिक न्यायालय हाथ पर हाथ धरे रह सकता है?'
राज्यपाल विधेयक रोके तो खोजें राजनीतिक समाधान
एसजी तुषार मेहता ने कहा कि सभी समस्याओं के लिए अदालतें समाधान नहीं हो सकतीं और लोकतंत्र में बातचीत को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, 'अगर किसी राज्यपाल की ओर से कोई निष्क्रियता दिखाई जा रही है, जो राज्य दर राज्य भिन्न हो सकती है और अगर कोई असंतुष्ट राज्य इस संबंध में अदालत का रुख करता है तो क्या ऐसी निष्क्रियता की न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह से रोका जा सकता है. हमें बताइए, इसका समाधान क्या हो सकता है?'
मेहता ने कुछ 'लचीलापन' अपनाने का आह्वान करते हुए कहा, 'मान लीजिए कि राज्यपाल विधेयक को रोके बैठे हैं तो ऐसे में कुछ राजनीतिक समाधान हैं, जिन्हें अपनाया जा सकता है. हर जगह ऐसा नहीं होता कि मुख्यमंत्री सीधे अदालत पहुंच जाएं. कई उदाहरण हैं, जहां बातचीत होती है, मुख्यमंत्री राज्यपाल से मिलते हैं, वह प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मिलते हैं और समाधान निकाल लिए जाते हैं.'
विवाद के समय राष्ट्रपति से मिल सकते हैं राज्यपाल
उन्होंने कहा कि गतिरोध सुलझाने के लिए कई बार टेलीफोन पर बातचीत की गई. मेहता ने कहा, 'पिछले कई दशकों से अगर कोई विवाद उत्पन्न होता है तो उसे सुलझाने के लिए यही प्रक्रिया अपनाई जाती रही है. प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल, राष्ट्रपति से मिलते हैं और कई बार कोई बीच का रास्ता भी निकाल लिया जाता है.'